Friday, October 3, 2014

(1) कुण्डलिया- छंदों में सूर तुलसी
सूर तुलसी व् जायसी, रहीम  रसखान,
सबके छंदों में रही,  उपदेशो  की  बात  
उपदेशो की बात,  सुझाई आम मनुज को,  
मन में रख सद्भावसन्देश दिया जन जन को।  
काव्य में निहित भावलगे अब लाख टके सी ,         
निर्मल करे स्वभाव, छंदों से सूर तुलसी ।| 
(2) साधक
साधक सब लिखते रहे, सद साहित्य अपार,
आन्दोलन सा यह लगेस्वच्छ बने जल धार।  
स्वच्छ बने जल धारतभी जीवन  बच पाए           
गंगा का रख मान,तन मन स्वस्थ हो जाए |          
सतत बहे रसधार, बने नहि कोई बाधक,                
समझे इसको सारअर्ज करते सब साधक
(3)  पतितपावन माँ गंगा          
माँ गंगा का मान है, जग में मोल अमोल
इसको मैली नहि करे,सब संतो के बोल |
सब संतो के बोल, किया दूषित जल भारी,              
किया घोर अपराधतोड़ दी सीमा सारी |         
निर्मल जल जन प्राण, रहे मन इससे चंगा,
सबका ही कल्याण, करे माँ पावन गंगा ।| 
(4) नीरसता
नीरसता में बदलता, नाशवान सुख भोग,

सुख दुख से ऊपर उठे,भौतिक सुख है रोग

भौतिक सुख है रोग, अंत में मन ही रोता

अपने अंतस देख, मिलन ईश्वर से होता

कह लक्षमण कविराय, भरे मन में समरसता,

जन्म सफल हो जाय, छोड़ मन से नीरसता |
 (5)  नशा

युवको में देखो नशा, सत्ता दे ना ध्यान,

जहर बेच कर काम दे, रोजगार का भान |

रोजगार का भान, दिनो दिन संख्या चढ़ती 
  
आमद की ये खान,नित दिन आमद बढती
  
दो युवको अब ध्यान,मदिरा पीकर भटको,

रहे देश का मान, देश ये अपना युवको ||

(6) मद्यपान
घर में नयन मद मधुरम, उसका रखना मान,
मद्यपान में अल्प मद, रहे तन का ध्यान|
रहे तन का ध्यान, भरे मद तन्मय रहते
बेटी से अनजान, कष्ट  घर के सब सहते |
समझे ये सरकार, आय नहि स्थाई इसमें,
युवक करे सम्मान, बढे खुशहाली घर में |
(7) मदिरा से आय
खुशहाली घर में घटे, अरु समाज में मान,
आय घटे, मान बढे, घटे देश की आन|
घटे देश की आन,व्यथित रहती सब जनता
मदिरा करे निषेध, उद्यम सभी का बढ़ता |
सम्रद्धि जब बढ़ जाय लगे छाने हरियाली,
मदिरा से क्या पायरहे छिनती  खुशहाली|
(8) संस्कारी बच्चे
बच्चे मुर्गा बन रहे, पुलिस लगाती गस्त,
खुली सड़क क्यों घूमते, आवारा से मस्त |
आवारा से मस्त, फिरे, माँ बाप लजाते,
लेते सुंदर सीख, समय क्यों व्यर्थ गँवाते |
मात पिता दे ध्यान, बने सपूत वे सच्चे,
भविष्य के आधार, सभी संस्कारी बच्चे || 

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