Thursday, April 28, 2016

कुंडलिया छंद - उन्ही का लेखन निख्र्रे
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निखरे छवि माँ शारदा,जब दे विद्या दान,
शिल्प स्वरों को साधते,जिसे मिले वरदान
जिसे मिले वरदान, ह्रदय में श्रद्धा रखते
माँ देती सौगात,स्वाद लेखन का चखते ।
कवि लक्ष्मण मतिमूड,हमेशा यूँ ही बिफरे
माँ देती आशीष, उन्ही का लेखन निखरे।
(2) प्यार से जीना सखे 
जीना जब संसार में, अन्तस से हो प्यार
जीवन जीना प्यार से, तब जीने में सार ।
तब जीने में सार, ह्रदय में खुशियाँ छाये 
सदा रहे खुशहाल, निराशा दूर भगाये ।
लक्ष्मण रह खुशहाल, बहाते रहे पसीना
कर के अच्छे काम, प्रेम से जीवन जीना ।
(3) भारत माँ के लाल 
भारत माँ के लाल का, खौल रहा था खून,
आजादी जल्दी मिले, मन में यही जुनून |
मन में यही जुनून, शीघ्र आये आजादी
मन में था अवसाद, देख होती बर्बादी |
शहीद हुए सपूत, देश वासी है आहत 
करता रहे प्रणाम, सदा ये पूरा भारत ||

Sunday, March 15, 2015

कुण्डलिया छंद (सन्दर्भ  - बंधन)
अनुशासन की पालना, करने को मजबूर,
प्यार भरा बंधन कहे,  मानो इसे जरूर |
माने इसे जरूर, ---- नहीं ये बंधन खारे
पंछी भरे उडान,-- ----पंख फैला दे सारे
लक्ष्मण यही विधान,नियम से चलता शासन ||
चले तभी संसार, सभी मानें अनुशासन ||
 (2)
बंधन बांधे वक्त ने, तोड़ काल के गाल
उजियारे को रोकते,  लगते वे जंजाल |
लगते वे जंजाल,  लांघ न सके मर्यादा
माने यदि प्रतिबन्ध,विधा के बंधन ज्यादा
कह लक्ष्मण कविराय, भाग्य पर करे न क्रंदन
ईश्वर कर्माधीन, कर्म बिन कटे न बंधन ||
(3)
आँखों में महसूसते, जो भी करते प्यार
कभी नहीं वे मानते, बंधन भी स्वीकार
बंधन भी स्वीकार, करे वे आखिर कैसे
छोड़ दिए घरबार, प्यार ही सबकुछ जैसे
कह लक्ष्मण कविराय,प्यार में अन्धें लाखों,
दिखता सच्चा प्यार, चमकता उनकी आँखों |

Friday, October 3, 2014

(1) कुण्डलिया- छंदों में सूर तुलसी
सूर तुलसी व् जायसी, रहीम  रसखान,
सबके छंदों में रही,  उपदेशो  की  बात  
उपदेशो की बात,  सुझाई आम मनुज को,  
मन में रख सद्भावसन्देश दिया जन जन को।  
काव्य में निहित भावलगे अब लाख टके सी ,         
निर्मल करे स्वभाव, छंदों से सूर तुलसी ।| 
(2) साधक
साधक सब लिखते रहे, सद साहित्य अपार,
आन्दोलन सा यह लगेस्वच्छ बने जल धार।  
स्वच्छ बने जल धारतभी जीवन  बच पाए           
गंगा का रख मान,तन मन स्वस्थ हो जाए |          
सतत बहे रसधार, बने नहि कोई बाधक,                
समझे इसको सारअर्ज करते सब साधक
(3)  पतितपावन माँ गंगा          
माँ गंगा का मान है, जग में मोल अमोल
इसको मैली नहि करे,सब संतो के बोल |
सब संतो के बोल, किया दूषित जल भारी,              
किया घोर अपराधतोड़ दी सीमा सारी |         
निर्मल जल जन प्राण, रहे मन इससे चंगा,
सबका ही कल्याण, करे माँ पावन गंगा ।| 
(4) नीरसता
नीरसता में बदलता, नाशवान सुख भोग,

सुख दुख से ऊपर उठे,भौतिक सुख है रोग

भौतिक सुख है रोग, अंत में मन ही रोता

अपने अंतस देख, मिलन ईश्वर से होता

कह लक्षमण कविराय, भरे मन में समरसता,

जन्म सफल हो जाय, छोड़ मन से नीरसता |
 (5)  नशा

युवको में देखो नशा, सत्ता दे ना ध्यान,

जहर बेच कर काम दे, रोजगार का भान |

रोजगार का भान, दिनो दिन संख्या चढ़ती 
  
आमद की ये खान,नित दिन आमद बढती
  
दो युवको अब ध्यान,मदिरा पीकर भटको,

रहे देश का मान, देश ये अपना युवको ||

(6) मद्यपान
घर में नयन मद मधुरम, उसका रखना मान,
मद्यपान में अल्प मद, रहे तन का ध्यान|
रहे तन का ध्यान, भरे मद तन्मय रहते
बेटी से अनजान, कष्ट  घर के सब सहते |
समझे ये सरकार, आय नहि स्थाई इसमें,
युवक करे सम्मान, बढे खुशहाली घर में |
(7) मदिरा से आय
खुशहाली घर में घटे, अरु समाज में मान,
आय घटे, मान बढे, घटे देश की आन|
घटे देश की आन,व्यथित रहती सब जनता
मदिरा करे निषेध, उद्यम सभी का बढ़ता |
सम्रद्धि जब बढ़ जाय लगे छाने हरियाली,
मदिरा से क्या पायरहे छिनती  खुशहाली|
(8) संस्कारी बच्चे
बच्चे मुर्गा बन रहे, पुलिस लगाती गस्त,
खुली सड़क क्यों घूमते, आवारा से मस्त |
आवारा से मस्त, फिरे, माँ बाप लजाते,
लेते सुंदर सीख, समय क्यों व्यर्थ गँवाते |
मात पिता दे ध्यान, बने सपूत वे सच्चे,
भविष्य के आधार, सभी संस्कारी बच्चे || 
कुंडलिया छंद-  १- पनघट
पनघट खाली हो रहे, रहा नही अब नीर,
इधर बाढ़ से दूर तक,दिखे नदियाँ तीर |
दिखे नदियाँ तीर,जलमग्न है थल सारा
गिरी मनुज पर गाज,प्रकृति से मानव हारा
उत्तरकाशी गाँव, बन गए  जैसे  मरघट
बचा कोई प्राण, सूने रह गए पनघट ||
 (2) नदिया

नदियाँ सब बेहाल है, नहीं मनुज का ध्यान,
वृक्ष सभी अब कट गए, नहीं रहे खलिहान |
नहीं रहे खलिहान, रहे किसान अब भूखे 
प्रकृति का नहीं ध्यान,गाँव में पढता सूखे |
समझे संकेत, मनुष्य गया क्यों सठिया,
रोजी रोटी भूख, सभी दे सकती नदियाँ ||

()– दो रंगी दुनिया 9.3.2014
दो रंगी दुनिया हुई, मन में बसता चोर,
रिश्ते की ढीली हुई, सबके मन की डोर 
सबके मन की डोर, सभी अपना हित साधे 
माया के बस मोह,  जपे ह्रदय से राधे 
गुरु शिष्य सम्बन्ध, बना सकते सतरंगी 
सपने हो साकार, रहे भाव दो रंगी |
(4 दुनिया दो रंगी )
दुनिया दो-रंगी हुई, फैला आज विकार 
अपनों से ही मिल रहा,दुश्मन सा व्यवहार 
दुश्मन सा व्यवहार, सभी रश्ते में मिलता 
करे दिखावा प्यार, नहीं लगाव का रिश्ता 
फितरत से लाचार, और में ढूंढे कामियां
मन में भरे मिठास, निभावे रिश्ता दुनिया |
 (5) गंगा जमने सभ्यता

गंगा जमनी सभ्यता,  देखे  विश्व  समाज
कुम्भ स्नान सब कर रहे,छोड़ छाड़ सब काज
छोड़ छाड़ सब काज, मगन होकर स्नान करे,
कविगण भी है आजसभी माँ का  ध्यान धरे
रखते सब सद्भाव,  यही मनोहर  सत्यता,
सुन्दर मन के भाव, गंगा जमनी सभ्यता       
(6).जज्बा
जज्बा रख यदि ठानले, लगे सफलता हाथ,
काम करे उत्साह से,मिले सभी का साथ 
मिले सभी का साथ,, सभी उत्साहित रहते
रखकर ऊँची सोच,, मदद आपस में करते
करे सोच कर काम,, लगे कभी भी धब्बा
संकट जाता हार, हो जब कर्म का जज्बा ||
(7)यात्रा एक आइना
यात्रा जैसा आइना, ज़रा गौर से देख 
सुन्दरता वर्णन करे, विद्वानों के लेख 
विद्वानों के लेख, बहुत सा संज्ञान मिले
पढ़े जब शिलालेख,सांस्कृतिकआभास मिले
बिन यात्रा के आप, ले सके ज्ञान वैसा 
मिले वही ये ज्ञान, स्थान हो यात्रा जैसा  ||  
(8चुनावी बिगुल
आता समय चुनाव का, मतदाता तब नाथ
वादे करते रहे, दल बल के सब साथ |
दल बल के सब साथ, करे नेता सब वादे 
जनता को है भान, नहीं है नेक इरादे |
कह लक्ष्मण कविराय,खेल गुण्डों को भाता    
करना सही चुनाव, सही अवसर यह आता