कुण्डलिया छंद (सन्दर्भ - बंधन)
अनुशासन की पालना,
करने को मजबूर,
प्यार भरा बंधन कहे, मानो इसे
जरूर |
माने इसे जरूर,
---- नहीं ये बंधन खारे
पंछी भरे उडान,--
----पंख फैला दे सारे
लक्ष्मण यही विधान,नियम से चलता शासन ||
चले तभी संसार,
सभी मानें अनुशासन ||
(2)
बंधन बांधे वक्त ने,
तोड़ काल के गाल
उजियारे को रोकते, लगते वे
जंजाल |
लगते वे जंजाल, लांघ न सके
मर्यादा
माने यदि प्रतिबन्ध,विधा के बंधन ज्यादा
कह लक्ष्मण कविराय,
भाग्य पर करे न क्रंदन
ईश्वर कर्माधीन,
कर्म बिन कटे न बंधन ||
(3)
आँखों में महसूसते,
जो भी करते प्यार
कभी नहीं वे मानते,
बंधन भी स्वीकार
बंधन भी स्वीकार,
करे वे आखिर कैसे
छोड़ दिए घरबार,
प्यार ही सबकुछ जैसे
कह लक्ष्मण कविराय,प्यार में अन्धें लाखों,
दिखता सच्चा प्यार, चमकता उनकी आँखों |
बहुत सुंदर
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